साम्राज्यवाद का सांस्कृतिक चक्रव्यूह
आज के नव उदारीकरण के दौर में भारतीय राज्य के साथ मिलकर साम्राज्यवादी ताकतें जमकर सांस्कृतिक हमला कर रही हैं. अमेरिका जैसे विकसित देश में हथियारों का उत्पादन , नशे की वस्तुओं का उत्पादन और व्यापार तथा इतर फुलेल यानि कोस्मेटिक्स की वस्तुओं का उत्पादन पर बड़े पैमाने पर किया जा रहा है और उनका जीवन इन्ही पर टिका है | मग़र ये तीनों बातें मानवता विरोधी हैं | अपने कोस्मेटिक्स तीसरी दुनिया के देशों और भारत जैसे देश में बेचने के लिए उसने पहले सांस्कृतिक धरातल पर हमारी मानसिकता को बदलने के लिए अभियान चलाये और सुन्दरता का कंसेप्ट ही बदल के रख दिया और "ब्यूटी कम्पीटीशन " का कंसेप्ट पिछले कुछ सालों में बड़े नगरों से चलकर शहरों से होता हुआ गाँव तक पहुँच गया है और किसी को ब्यूटी कम्पीटीशन से कोई आपत्ती नहीं है | विरोध का दिखावा करने वाले लोगों के न्योते पर ही माइकल जैक्शन एक बार बॉम्बे आया था | ज्यादातर संसार की सुन्दर युवतियां तीसरी दुनियां के देशों से चुनी जाती हैं | आखिर क्यों ? इतर फुलेल बेचने की नियत इसके पीछे रहती है | इसी प्रकार यदि हथियार चलेगा तो विनास ही करेगा | मग़र जंग का माहौल बनाये रखने के प्रयास जारी रहते हैं | नशे और दारू का व्यापार बड़े पैमाने पर बढ़ाने और अपनी सी आई ए की गतिविधियों को छिपा कर रखने के लिए बड़े पैमाने पर नशीली दवाओं व दारू का माफिया तीसरी दुनिया में खड़ा कर दिया गया इन देशों कि सरकारों के प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन के साथ | ये जो संस्कृति का पतन भारत और हरयाणा जैसे प्रान्त में देखा जा रहा है इसकी जड़ें वट वृक्ष की जड़ों के समान विकसित देशों खासकर अमेरिका तक फ़ैली हूई हैं इसको नजर अंदाज करना ठीक नहीं होगा | भारत जैसे गरीब देश में अमरीका के बाद भारत के पास दूसरे नंबर पर टी. वी. चैनल्स हैं. इसका कोई ख़ास मतलब है. अच्छे-खासे लोग इसमें फंसते जा रहे हैं. इन चैनलों पर दो तरह की चीजें परोसी जा रही हैं. एक तो रामायण जैसे ढेरों धारावाहिक रोज दिखाए जा रहे हैं (इसमें महाभारत थोडा भिन्न था, " भारत एक खोज भी",बाकी तो कूड़ा है). हमारे भारत महान देश की विडम्बना यह है कि हमारे यहाँ माईथोलोजी को माईथोलोजी के रूप में नहीं , अक्षरश: धार्मिक रूप में लिया जाता है. धारावाहिक के सामने पूजा होती है. विदेशों का आदमी इस ढंग से शिक्षित है कि सारी चीजों की समीक्षा करके देखने की उसकी क्षमता है | इस माईथोलोजी की सच्चाई को ज्यादातर लोग जानते हैं समझते हैं और इसे कहानी के रूप में लेते है मग़र भारत जैसे देश में शिक्षित लोग भी अवैज्ञानिकता के बड़े पैमाने पर शिकार हैं और समीक्षा करना उनकी चेतना का हिस्सा नहीं बन पाया है . ये सीरिअल अब भारी पैमाने पर सामान्य लोगों की चेतना को और कूंद करने के लिए दिखाए जा रहे हैं. यदि इससे लोग बच जाते हैं तो फेनटेसी के सीरिअल दिखा कर अवास्तविक दुनिया में लोगों को पहुंचा दिया जाता है. और वे अपनी वस्त्विकं बेचैनी को भूल जाते हैं | इसके अलावा उच्छ्रंखल साम्राज्यवादी धारावा हिक दिखाए जा रहे हैं. नए टी.वी.चैनल्स में यह और भी ज्यादा हैं | कोई देश इन चैनलों पर नियंत्रण बनाने की हालत में नहीं है | चैनल्ज की " डारेक्ट टू होम " डेलिवरी ने समस्या को और ज्यादा जटिल बाना दिया है | ज्यादा है.ज्यादातर नंगी तस्वीरें दिखाते हैं-वे हमारी मूलभूत सहज्वृति से खेल रहे हैं. (playing on basic instincts.) फिर माइकल जैक्सन, यान्नी भी टी.वी.पर आते हैं. इसमें फंसने वाले लोगों की संख्या भी बहुत है. रही सही कसर कंप्यूटर कैफों ने पूरी कर दी है जहान पोर्न मटेरिअल बड़े पैमाने पर युवाओं को परोसा जा रहा है | बहुत बड़ी इच्छा शक्ति की जरूरत है हमारे देश के बच्चों और बुजुर्गों तक इस पोर्नोग्राफी के बढ़ते कहर से बचने के लिए | मग़र वह इच्छा शक्ति कैसे पैदा होगी आज के नव उदारीकरण के दौर मैं यह बड़ा सवाल है |
यह सब जो हो रहा है हमारे देश में इसके लिए जमीन सबसे अच्छी है. अंधविश्वास-भुखमरी सबसे ज्यादा है. लोग पस्तहिम्मती में जी रहें हैं. असली जिंदगी में कुछ नहीं मिलता तो वे उसे मास फंतासी (mass fantasy) में पाने की आशा करते हैं. क्योंकि खुद जैसे जी नहीं सकते तो दूसरों को वैसा जीवन जीते देख कर जी रहे हैं. जैसे प्रेम करने के लिए कोई काली ,और साधारण से साधारण भी लड़की नहीं मिलती बड़ी संख्या को लेकिन सिनेमा में बैठते हैं तो खूबसूरत, करोड़पति की लड़की से गरीब नौजवान को प्रेम करते हुए देखते हैं और खुद को उसकी जगह पर रखकर खुश हो लेते हैं. और जब बीभत्स व कुरूप असली दुनिया से उनका सामना होता है तो उनकी रूह तक काँप जाती है. इसी प्रकार, क्रिकेट, तैराकी - यह देखना एक नकली चीज है. दिखावे में रहना है | लोगों की भारी संख्या इसमें जीने लगी है जबकि खुद खेल नहीं सकते. (जो खेल लेते हैं उनकी बात अलग है,खेलना अच्छी बात है.) यह उनकी जीवन शैली में शामिल हो गया है | इसके अलावा खेल में विज्ञापनों को देखकर बाजार तैयार किया जता हैं. सारी चीजों से वंचित होकर लोग टी. वी. से चिपके रहते हैं. औरत को इस बाजार में चीजें बेचने के लिए एक "वस्तु " ऑब्जेक्ट के रूप में पेश किया जाता है और ऐसा करके उसके शरीर के बूते पर बाजार में स्पर्धा का माहौल बनाया जाता है | इससे ज्यादा अवमूल्यन किसी महिला का और क्या हो सकता है इस समाज में ?
साम्राज्यवादी दानव नौजवानों में उन्माद और पागलपन भर रहे हैं. इसी का नतीजा है कि बिगडैल नौजवान द्वारा मासूम लड़कियों का आये दिन शिकार किया जाना अखबारों की मुख्य खबरों में है. हम बहुत गरीब हैं तो क्या हुआ एक सामान्य जिंदगी तो जी ही सकतें हैं, ढंग से. इसके बजाय दूसरों को जीते हुए देखना और उससे या तो संतोष कर लेना या उन्माद का शिकार हो जाना मानसिक बीमारी है. यही रुग्न मानशिकता ज्यादातर यौन उत्पीडन के लिए जिम्मेदार है न कि गईं पहनना या महिला का पहनावा |
इतिहास के रास्ते में धर्म जब शुरू हुआ था उस समय आदमी असहाय था, कोई न कोई पराभौतिक चीज (धर्म, ईश्वर) की जरूरत थी जिसके सहारे अपनी कमजोरी के बावजूद जीने कि कोशिश करता. आज भी कुछ वैसा है दूसरी परिस्थिति में. लाखों करोड़ों लोग फंतासी में जीते हैं. It is more or less a sign of sick mentality......ऐसा पुणे विश्वविद्यालय में श्याम बेनेगल ने अपने भाषण में कहा था. ठीक ही कहा था. जैक्सन, यान्नी जो तकनीक-लाईट अपने कार्यक्रम में इस्तेमाल करते है उसमें आदमी खो जाता है. पर्फोर्मेर की बात ख़त्म हो जाती है, लोग तकनीकी की चकाचौंध से प्रभावित हो जाते है. यान्नी तो तकनीक के बिना एक घटिया कम्पोजर से ज्यादा कुछ नहीं. लेकिन बेचने वाली कम्पनियाँ तकनीक (पब्लिसिटी आदि) के आधार पर उसे बेच रहीं है. और लोग स्वस्थ कला की विकल्पहीनता की स्थिति में उसकी तरफ दौड़ रहें.
आज बड़े अखबारों की हालत भी बहुत दयनीय है | कार्पोरेट सैक्टर ने इस पर जबरदस्त पकड़ बाना ली है | लोगों की समस्याओं को एक संसंनी वाली खबर के रूप में पेश किया जाता है|बहुत अनाप शनाप भी आ रहा है | मग़र एक हिस्सा संघर्ष शील भी है मीडिया का |. बड़े अख़बारों में ज्यादातर में कोई उपयोगी सामग्री नहीं आ रही है. छोटे अखबारों में कुछ स्थानीय समस्याएं तो आती हैं- कहाँ बलात्कार हुआ,कहाँ चीनी नहीं मिल रही है; इन खबरों का फिर भी कोई मतलब है बड़े अखबार आडवाणी-मोदी-अन्ना-मनमोहन के बारे में चटकारे लेकर लिखते हैं. इसी प्रकार, जितने भी टी. वी. चैनल्स आप बादल कर देख लें दिखाया तो वही जा रहा होता है -कूड़ा. वे ढंग की अच्छी चीजें लाइब्ररी से हटाकर लेखागार (archive) में डाल चुके है. अच्छे सिनेमा आज कभी-कभार ही फिल्म चैनल्स पर दिखाए जाते हैं. शहरों फिल्म हालों का बुरा हाल है | अपने को बचाए रखने के लिए बहुर ही तीसरे दर्जे की फ़िल्में दीखाई जाती हैं | कई सिनेमा हालों की जगह माल ने ले ली हैं| बहुत काम सिनेमा हाल त्थीक चल रहगे हैं मग़र उनकी टिकट बहुत महंगी हो गयी है | जो हैं उनमें फिल्म एक भी देखने लायक नहीं होती, अच्छी फ़िल्में महानगरों में ही इक्का-दुक्का आती हैं और कम लोगों के बीच ही इस प्रकार पहुँच पाती हैं. यह सब करना आज साम्राज्यवादियों के लिए जरूरी हो गया है. यदि उन्हें आर्थिक बल पर राज करना है और उनकी शोषणकारी व्यवस्था टिकाऊ हो तो उन्हें इन क्षेत्रों को अहमियतका पूरा ज्ञान है . लोगों को मानसिक गुलाम बनाकर शासन करना लोगों को सीधे गुलाम बनाने के बजाय आसन भी है और ज्यादा दूरगामी भी है, यह बहुत दिनों तक चल सकता है. बन्दूक के दम पर शासन का अर्थ होता है कि अब उनके दिन लदने वाले हैं.
लोगों को एक ख़ास तरह से ढाला जा रहा है ताकि वे एक ख़ास तरह की चीजें ही देखें. एक ख़ास तरह का जानवर बनाकर लोगों को सेट किया जा रहा है. लोगों को एक ख़ास किस्म का उपभोक्ता बनाया जा रहा है. इस चक्रव्यूह को तोडना आज के क्रांतिकारी आन्दोलन के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती है. इस चुनौती को हमारी पिछली गली सड़ी सामंती संस्कृति के बाल बूते पर नहीं लड़ा जा सकता | जनतांत्रिक सेकुलर सर्व समावेशी संस्कृति ही इस चुनौती का सामना कर सकती है | हमारी लडाई ज्यादा कठिन है एक तरफ साम्राज्य वादी ताकते है तो दूसरी तरफ सामती संस्कृति का आक्रोश है | बहस के लिए कुछ मसले ही इंगित हो पाये और भी कई गंभीर मुद्दे हैं |
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